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Baccho ki Kahani : doguni sja nahi tinguni sja | motivational stories for students

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Baccho ki Kahani : doguni sja nahi tinguni sja | motivational stories for students


Baccho ki Kahani : doguni sja nahi tinguni sja | motivational stories for students| aparna majumdar


चंपकवन में वानरों का परिचय सम्मेलन आयोजित किया गया था. इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए विभिन्न वनों से वानर आए थे. यहां सभी वानर आपस में एक-दूसरे से मिल रहे थे और उनसे दोस्ती कर रहे थे.

वानरों के सम्मेलन में जैकी लोमड़ी भी पहुंचा. वानरों में लोमड़ी को देखकर सभी वानरों को आश्चर्य हुआ.

वानरों के अध्यक्ष ने जैकी से पूछा, ‘‘यहां वानरों का सम्मेलन चल रहा है. यहां आप जैसे अन्य जानवरों का कोई काम नहीं है.’’



‘‘मैं यहां स्वयं अपनी मर्जी से नहीं आया हूं. मुझे तो आपके कुल देवता ने अपना दूत बनाकर भेंजा है.’’ जैकी ने विनर्मता से कहां.

‘‘हमारे कुल देवता ने....?’’ वहां उपस्थित सभी वानरों ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘हां, आपके कुल देवता ने मुझे आप लोगों की गरीबी दूर करने के लिए एक-एक करोड़ रूपये देने के लिए भेंजा हैं.’’

जैकी की बातें सुनकर वहां उपस्थित वानरों में हड़कप मच गया. सभी अमीर बनना चाहते थे. सभी कहने लगे ‘मुझे रूपये दो मैं अमीर बनना चाहता हूं.’

जैकी ने सभी को शांत करते हुए कहां, ‘‘आप में से जिन्हें रूपये चाहिए वे अपनी तरफ से भगवान की चरणों में रूपये भेंट देने होगें. आप जितना दोगें उसका तीन गुणा रूपया आपको दिया जाएगा. आप सभी को एक ओर बात बता दूं कि यह रूपये सिर्फ वानरों को ही दिया जाएगा, इसीलिए वानरों के अतिरिक्त ओर किसी को इसकी भनक नहीं लगनी चाहिए. जिसे भी रूपये चाहिए वे मेरे घर पर आकर रूपये ले जा सकता है.’’

जैकी के जाने के बाद जंपी ने सभी वानरों को समझाते हुआ बोला, ‘‘मुझे तो लगता है इसमें उसकी कोई चाल है.’’

लेकिन सभी ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया. उनका कहना था कि जब कोई रूपये दे रहा है तो फिर हम क्यों न लें. हम सभी अमीर बनना चाहते है.



आखिर में जंपी ने सभी को शांत करते हुए कहा, ‘‘ठीक है मैं पहले जाकर देखूगा की उसने जो कहां है वह सच है कि नहीं. यदि जैकी की बात सच हुई तो तुम लोग भी रूपये लेने जा सकते हो.’’

दूसरे दिन जंपी अपने साथ पांच हजार रूपये लेकर जैकी के घर पहुंचा. जंपी ने रूपये देते हुए कहा, ‘‘भगवान को चढ़ाने के लिए रूपये लाया हूं.’’


जैकी ने एक तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘रूपये मुझे नहीं भगवान के चरणों में रख दो.’’

जंपी ने रूपये वहां रख दिए और एक तरफ हाथ बांध कर खड़ा हो गया.
‘‘अब तुम जा सकते हो, शाम को आकर अपने रूपये ले जाना.’’ जैकी ने कहां.

जंपी शाम को ठीक समय पर जैकी के पास पहुंच गया. जंपी को देखकर जैकी ने पन्द्रह हजार रूपये जंपी को देते हुए कहां, ‘‘यह लो तुम्हारे रूपये. यदि तुम और रूपये चाहते हो तो भगवान के चरणों में और रूपये अर्पित कर सकते हो, लेकिन एक करोड़ से ज्यादा किसी को नहीं मिलेगा.’’

जंपी ने आकर सभी को रूपये दिखाते हुए कहां, ‘‘जैकी सही कह रहा था, देखो उसने मुझे पांच हजार के पन्द्रह हजार रूपये दिए है. मैं चाहूं तो इन रूपयों को देकर और रूपये ले सकता हूं.’’



जंपी के हाथ में रूपये देखकर अन्य वानरों ने भी अपने पास की जमा पूंजी जैकी के पास जाकर जमा करने लगे. उन्हें भी अपनी रकम का तीन गुना रूपया मिला.

धीरे-धीरे वानरों में लालच आने लगा. शुरू-शुरू में वे समुह में जाते थे, लेकिन अब दूसरे से अमीर बनने केे चक्कर में चोरी छुपे अकेले जाने लगे. इतना ही नहीं उन्होंने अपने मेहनत की कमाई को तो दावं पर लगाया ही साथ ही साथ अपना घर, गाड़ी, खेत-बगीचे भी बेच दिए.

कई वानरों ने ऊचें ब्याज दर पर साहूकारों से मोटी रकम उधार लिया. कुछ साहूकारों के पास रकम नहीं था तो उन्होंने शहर जाकर स्वयं दूसरे साहूकारों से ब्याज पर रूपये लाकर इन वानरों को रूपये उधार दिए.

हरि वानर ने अपना घर बेच दिया और एक लाख रूपये ले जाकर जैकी को दे दिया.

जूली बंदरिया ने तो अपने सारे जेवर यह सोचकर बेच दिया कि इन रूपयों के बदले जो रूपये मिलेगें उनसे वह नय डिजाइन के गहने खरीद लेंगी.

मोनू ने अपनी दूकान गिरवी रख कर दो लाख रूपये और ब्लैकी ने अमीर बनने के लिए अपना स्कूटर, घर, खेत सब कुछ औनेपौने भाव में बेच दिया.

कुछ वानर तो अपना काम धन्धा छोड़कर जैकी के घर के आसपास ही डेरा जमाकर बैठ गए. जैकी द्वारा रूपया मिलते ही वे तुरन्त उस रूपये को तीन गुना करने के लालच में फिर से रूपया जैकी के पास जमा कर देते थे.

शुरू-शुरू में जैकी उन्हें तुरन्त रूपये दे देता था, लेकिन अब रकम ज्यादा जमा होने की वजह से उन्हें एक सप्ताह और फिर वह एक महिने बाद रूपये लौटाने लगा.



धीरे-धीरे कई महिने बीत गए. वानरों द्वारा अपना घर, खेत-बगीचे, गाड़ी दुकान आदि सस्ते दामों पर बेचने की खबर सूनकर राजा शेरसिंह का माथा ठनका. उन्होंने इंस्पेक्टर चीतासिंह से इस बारे में पूछा तो उसने सारी बाते उन्हें बता दी.

चीतासिंह की बात सुनकर राजा शेरसिंह बोले, ‘‘यह तो धोेखाघड़ी है. इस तरह कोई तीन गुना रूपये कैसे दे सकता है. पढ़ेलिखें जानवर भी सालभर मेहनत करें तब भी उन्हें इतना रूपया नहीं दे सकता.’’

‘‘महाराज, जब तक हमें उसके खिलाफ शिकायत नहीं मिलेगी, तब तक हम कुछ नहीं कर सकते है.’’ चीतासिंह ने कहां.

कुछ देर सोचने के बाद राजा शेरसिंह बोले, ‘‘ठीक है, तुम जैकी पर कड़ी निगाह रखो. कोई गड़बड़ी हो तो तुरन्त उसे गिरफ्तार कर लेना.’’

चीतासिंह ने अपने कुछ विश्वसनीय साथियों के साथ मिलकर जैकी पर नजर रखने लगे.

इधर वानरों द्वारा लाखों रूपया जमा हो जाने के बाद अब जैकी उन्हें रूपये वापस करने में आनाकानी करने लगा.

जिन्होंने साहूकार से रूपये लिए थे, समय पर ब्याज न मिलने से साहूकार अपनी रकम जल्द से जल्द लौटाने के लिए उन्हें परेशान करने लगे.

जब कई महिने बीत गए तो हरि, सोनू, जूली की चिंता बढ़ने लगी. उन्होंने थाने में जाकर जैकी के खिलाफ शिकायत कर दी.

शिकायत मिलते ही चीतासिंह जैकी को पकड़ने के लिए उसके घर पर पहुंचा. लेकिन जैकी अपने घर पर नहीं था. यह देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्होंने स्वयं अपने साथियों के साथ लगातार उस पर निगाह रखे हुए थे.

ऐसे में उसे किसी ने भी घर से निकलते हुए नहीं देखा था. इसका मतलब जैकी यही घर में ही कहीं छुपा होगा, लेकिन कहां. पूरा घर ढूंढ़ लिया था. वहां छुपने की ऐसी कोई जगह नहीं थी.


चीतासिंह ने जासूस टाॅमी डाॅगी को जैकी का पता लगाने का काम सौंपा.

टाॅमी बड़ी सावधानी से घर का निरीक्षण करने लगा. घर के एक कोने में जाकर टाॅमी ने भौंकते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है यहां कोई गुप्त तहखाना है. इसका दरवाजा यहीं कहीं पर होना चाहिए.’’ कहते हुए वह कमरे में कुछ ढूढ़ने लगा.

‘‘मैंने एक फिल्म में देखा था, ऐसे तहखाने के दरवाजे को खोलने के लिए कोई बटन होती है. जिसे दबाते ही वह खुल जाता है.?’’ चीतासिंह ने कहा.


‘‘हां, लेकिन यहां तो बटन जैसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है.’’ टाॅमी ने चारों ओर देखते हुए कहा.

तभी चीतासिंह की नजर मुर्ति पर गई. उन्होंने मुर्ति को उठाने की कोशिश की लेकिन वह अपनी जगह से उठी नहीं. तब टाॅमी ने कहां, ‘‘इसे दाएं-बाएं घुमाकर देखों.’’

मुर्ति को बाएं घुमाते ही नीचे का फर्श खुल गया. वहां से नीचे जाने की सीढ़िया थी.

चीतासिंह और टाॅमी सावधानी से नीचे उतरने लगे. नीचे लंबा चैड़ा हाॅल बना हुआ था. उससे लगे हुई कई कमरे थे. उन कमरों में रूपये और जेवर रखे हुए थे.

एक कमरे में जैकी भी मिल गया. चीतासिंह ने उसे गिरफ्तार करके राजा शेरसिंह के सामने पेश किया.

जैकी के गिरफ्तार होते ही वानरों ने अपने-अपने रूपये की वापसी की मांग करने लगे.

राजा शेरसिंह ने शिकायत करने वाले सभी वानरों को भी गिरफ्तार करने का आदेश देते हुए कहा, ‘‘जैकी जितना दोषी है, उससे ज्यादा दोषी ये वानर है. जिन्होंने बिना मेहनत के करोड़पति बनने के लालच में अपनी मेहनत की कमाई बिना सोचे समझे खो दी. जैकी को जितनी सजा दी जाती है उनसे दो गुना सजा उन्हें भी दी जाती है.’’

राजा शेरसिंह का फैसला सुनकर सभी वानर पछताने लगे, क्योंकि लालच में आकर धन तो खोया ही साथ ही सजा भी मिली.

चीतासिंह ने कहां, ‘‘महाराज इन्हें दोगुनी नहीं तीगुना सजा मिलना चाहिए.’’

यह सुनकर सभी वानरों का शर्म से सिर झुक गया. (Copyright: All Rights aparna mazumdar)


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